शहर के भीड़- भाड़
वाले इलाके से बस अब काफी दूर आ चुकी थी , बस में मैगजीन पढ़ते हुए करीब चार- पांच
घण्टे का सफर भी कट चुका था । खिड़की के शीशे को हटाकर देखा ,हल्की सी ठण्डी हवा
अंदर आयी , कुछ ताजगी सी महसूस हुई। बस की
तेज रफ्तार में पेड़ पीछे भागते हुए मानों
अलविदा कहते हुए नजर आ रहे है, पेड़ –पौधों के झुरमुटों में निर्जनता का साया पसरा
हुआ है। आगे कुछ और दूर चलने पर
ड्राइवर ने बस रोक दी, अभी भी मेरा लगभग
दस किलोमीटर का सफर बाकी था , साथ के
यात्री भी बैठे- बैठे ऊब चुके थे। नीचे उतर कर लोग चाय- पानी करने लगे। मैं भी एक
कुल्हड़ में चाय लेकर किनारे पड़ी एक बेंच पर
बैठ गया । चाय पीते-पीते इसी जगह से जुड़ी कुछ यादें ताजा हो गयी ।
चाय की चुस्की लेते
हुए जिंदगी सात –आठ साल पीछे की यादों में खो गयी , पुरानी बातें एक- एक करके मुझे रोमांचित करने लगी और मैं बड़ी
तल्लीनता से उन लम्हों को जीने लगा । इतने में बस कंडक्टर बस में आने के लिए
आवाज देने लगा , लेकिन बस में मेरी दोबारा
जाने की इच्छा नहीं हुई। मैं सोच ही रहा था कि इतने में बस चल पड़ी और मैं नीचे ही
रह गया ।
सात-आठ साल पहले भी
मैं इसी स्थान पर अकेले ही उतरा था, लेकिन तब के हालात् कुछ और थे। उस जमाने में
बस केवल यहीं तक आती थी , आगे के सफर के
लिए रिक्शे या तांगे का सहारा लेना पड़ता
था। समय के साथ-साथ अब बहुत कुछ बदल चुका था।
उन दिनों सर्दियों के मौसम में अंतिम बस लखनऊ से पकड़
कर मैं यहां रात को करीब दस बजे पहुंचा था
। बस में मेरे अलावा मेरी ही उम्र का लड़का रह गया था, बस के रुकने के बाद दोनों नीचे उतरे। हम दोनों नीचे उतर कर इस
उधेड़-बुन में पड़ गये थे कि मध्यरात्रि की कड़कड़ाती ठण्ड में आखिर कहां जाया
जाएं। आगे चार –पांच सौ मीटर पर कुछ दुकानें थी जो अब बंद हो चुकी थी। अंधेरी रात
में रह-रहकर कुत्तों के भौंकने की आवाज
कानों में पड़ रही थी। उस लड़के से बातें करते हुए कुछ दूर आगे बढ़े लेकिन ठण्ड में दोनों बुरी तरह से कांप रहे थे ।
मैं लड़के से पूंछा कि- “अभी तुम्हारा घर कितना दूर है”। भैया अभी एक
कोश दक्षिण में जाना है। बहरहाल,
वहां कि ठण्डी रात में घूमने से बढ़िया
यह सोचा कि इसके घर ही चलें। दोनों बातें करते हुए उसके गॉव की तरफ चल दिए।
कंपकपाती ठंड में बोलना भी मुश्किल हो रहा था, करीब आधे घण्टें में घूमते हुए हम
अपनी मंजिल पर पहुंच गये।
दो झोपड़ियां आमने-
सामने पड़ी हुई थी,दूर-दूर तक पास में कोई घर दिखाई नहीं पड़ रहा था । मैं बाहर ही
खड़ा था, वह अंदर गया और मां को आवाज देने लगा । थोड़ी ही देर में मां के साथ बाहर आया,
उसकी मां ने मुझे अंदर आने के लिए इशारा किया , अंदर जा कर मुझे अजीब सा महसूस हो रहा था लेकिन
जान बचानी थी इसलिए शान की कोई अहमियत नही
थी, पहली बार इस प्रकार नया अनुभव था।झोपड़ी के अंदर दो टूटी-फूटी चारपाई पड़ी हुई, बगल में
हल्की-हल्की रोशनी देती हुई एक डिबरी टिमटिमा रही थी। एक या दो मीटर के दायरे में
तीन बकरियां बंधी हुई थी, उनके बच्चे खुले हुए थे, वे घूम रहे थे । दूसरी झोपड़ी
में कुछ सामान, लकड़ियां और बकरियों के लिए चारा वगैरह
रखा हुआ था। घर में मां, बेटे के अलावा
एक आठ- नौ साल की बच्ची भी थी।
घर की सारी
जिम्मेदारी बाप के असमय गुजर जाने के बाद उस लड़के के ऊपर आ पड़ी थी। महज पंद्रह – सोलह साल की उम्र में मुसीबतों से
संघर्ष करता हुआ वह एक छोटी सी पान- बीड़ी
की दुकान से तीन लोंगों का पेट पाल रहा था।
लड़के से बातें करता
हुआ मैं चारपाई पर बैठ गया, बाहर मौसम का मिजाज भी बदल रहा था। उस रात जिंदगी कुछ
नये पाठ पढ़ा रही थी, थोड़ी ही देर में बारिस के शुरु होते ही जिंदगी का इम्तिहान
भी शुरु हो गया । बच्ची भागकर दूसरी झोपड़ी से कुछ सूखी लकड़ियां और पत्ते लेकर
आई, उनको इकट्ठा करके जलाने लगी, माचिस के नम हो जाने से जल नहीं रही थी। बहरहाल,
थोड़ी ही देर में अलाव जला, कुछ राहत सी महसूस हुई।
खाना खायें लगभग पंद्रह घण्टे
हो गये थे, भूख भी जमकर इम्तिहान ले रही थी। मां एक हाथ में चिल्ड वाटर और दूसरे
हाथ में गुड़ लेकर आयी। गुड़ खाकर पानी
पीया, अब जाकर भूख से राहत मिली । बातें करते –करते हम एक दूसरे से काफी घुल-मिल
गये । बातों- बातों में काफी बातें हो गयी। हल्की- हल्की बूंदा-बांदी में
मध्यरात्रि के शांत पहर में हम एक- दूसरे
के साथ जिंदगी को काफी करीब से महसूस कर और देख रहे थे । उसकी मां कुछ संकोच में
थी कुछ कहना चाह रही थी लेकिन कुछ कह नहीं
पा रही थी , बच्ची बड़ी मेहनत से लकड़ी ला-लाकर अलाव जला रही थी और खुश होकर बातें
भी कर रही थी, रह-रहकर ठण्डी हवाएं चलती, आंच धीमी पड़ जाती और सारा बदन शिहर उठता
। इन सब के बावजूद उस परिवार की खुशी देखकर मैं भी सहज ही महसूस कर रहा था । माता
जी कुछ देर बीतने के बाद दो कटोरे में बकरी का गरम दूध और चार- पांच सूखी रोटियां
लेकर आई। सामने रखकर उन्होनें बड़े
संकोचपूर्वक खाने का ईशारा किया । पहली बार बकरी का दूध खाना था, मैं असहज हो गया
था, मना भी नहीं कर सकता था । मेरे ऊपर अपनी भूख से ज्यादा उसका सम्मान हावी था ।
लड़के ने भी मुझे खाने के लिए ईशारा किया
फिर दोनों ने खाना खाने में लग गये। बकरी के दूध का स्वाद कुछ अजीब-सा लग रहा था
लेकिन प्यार और सत्कार ने खाने को स्वादिष्ट बना दिया था। खाना खाने के बाद फिर हम
तीनों हाथ सेंकने लगे। कुछ देर तक मैं बच्ची को सोने के लिए कहता रहा लेकिन उसे
बातें करनें में मजा रहा था ।
बातें करते
हुए कुछ रात बीत जाने के बाद मां बेटी एक खाट पर सोने चली गयी और दूसरे पर उस
लड़के के साथ मै सोया । पूरी रात मुझे
नींद नहीं आयी। सुबह हुई, सबको अपने काम
पर जाना था और मुझे भी काफी सफर तय करना था। घर जाने के लिए मैं तैयार हुआ , एहसान
व्यक्त करने के लिए मैं जुबान नहीं दे पा रहा था। मेरे पॉकेट में कुल एक सौ सत्तर
रुपये पड़े हुए थे, उन पैसों को उनकों देने लगा और मेरे पास देने के लिए कुछ था भी
नही। लेकिन तीनों ने पैसे लेने से मना कर
दिया , काफी प्रयास करने के बावजूद वे
पैसे नही लिये।
उसके बाद मैं फिर उसी रास्ते पर वापस गया , जहां से सफर को बीच में छोड़ कर गया था।
इस प्रकार समय बीतता
गया और ये कहानी धुंधली पड़ती गयी। मैं एक –दो साल बाद शहर में आ गया ।
आज फिर उसी
स्थान पर आने के बाद मैं फिर उसी रात को जी रहा हूं। लेकिन यहां दूर-दूर तक उन
झोपड़ियों के कोई निशान तक नहीं दिखाई पड़ रहे है। बस यहं निर्जनता पसरी हुई है और
मैं आज उस एहसान तले खड़ा होकर खुद को कोंस रहा हूं। काश! लोगों से एक बार फिर मिल पाते..........
।


sarahniya prayas
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