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मा नव जीवन को वैचारिक रुपी आभूषण की तरह शोभित करने वाली शिक्षा अभी भी
संतोषजनक पड़ाव पर पहुंचने पर नाकामयाब़ रही है।
प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक
सुधार और विकास की आवश्यकता लगातार बनी हुई है। मौजूदा दौर के तकनीकि प्रतिस्पर्धा
के युग में सम्पूर्ण विकास को उच्चस्तरीय गुणवत्ता युक्त शैक्षिक मानक से ही
निर्धारित किया जा सकता है। गत् दशक के अंत में साक्षरता दर 74 फीसदी तक पहुंची,
लेकिन क्या इस बात से संतुष्ट हुआ जा सकता है कि आजादी के 64 साल बाद भी एक चौथाई
आबादी अंगूठा टेक है। महिलाओं की स्थिति में सुधार की गुंजाइश का अंदाजा इस बात से
लगाया जा सकता है कि 35 फीसदी महिलाएं अभी भी अशिक्षा के अंधकार में जी रहीं हैं।
अशिक्षित वर्ग को विकास की मुख्य धारा से जोड़ने
का प्रयास महज कल्पना आधारित है, वास्तव में यह असंभव भी है। जागरुकता और पारदर्शी
क्रियाकलाप एक विकसित समाज के द्योतक है। अशिक्षा की स्थिति में जागरुकता का संचार
अकल्पनीय है।
अशिक्षा के अंधकार को मिटाने के लिए
सरकारी बजट में वर्ष 2010-11 के लिए कुल 52,057 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया
है। जिससे शिक्षा के आधारभूत ढ़ाचे का
विकास और उच्च शिक्षा के उत्थान की उम्मीद की गयी है।
भारत सरकार के शिक्षा के अधिकार के तहत
2.31लाख करोड़ रुपये मानव संसाधन विकास मंत्रालय को आवंटित कर शिक्षा के नये
प्रतिमान स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण
कदम उठाया है। इस राशि के तहत शिक्षकों की संख्या में सुधार और मूलभूत सुविधाओं पर
जोर दिया जायेगा। विगत वर्षों में शिक्षा के निजीकरण की प्रकिया अपेक्षाकृत तेज
हुई है। मौजूदा वर्ष में कुल निजीकृत शैक्षिक बाजार 2008 की तुलना में 40 अरब डॉलर
से बढ़कर कुल 68 अरब डॉलर हो गया है नतीजतन तकनीकि शिक्षा ग्रहण करने वाले की
संख्या 20 लाख तक पहुंच चुकी है,जो 2007-08 के मुकाबले दोगुनी है।
प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में गुणवत्ता
को सहेज पाने की चुनौती है। इस प्रक्रिया में कुशल शिक्षकों की भूमिका अति महत्वपूर्ण
होती है लेकिन प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी की समस्या से निजी शैक्षिक संस्थानों से
लेकर सरकारी संस्थान जूझ रहे है।
देश के प्रतिष्ठित संस्थानों, विश्वविद्यालयों,
कालेजों में फैकल्टी की समस्या की वजह से छात्र स्तरीय शिक्षा से वंचित हो रहे हैं।
देश के कुल 436 विश्वविद्यालयों और 25938 कालेजों के संचालन का जिम्मा 4.88 लाख
शिक्षकों पर है वहीं अध्यापकों और छात्रों का अनुपात एक और चौबीस का है, नतीजतन
देश की 121 करोड़ की आबादी में केवल लगभग पौने दो करोड़ लोग ही पोस्ट ग्रेजुएट है।
तकनीकि शिक्षा की जिम्मेदारी आई आई टी
जैसे संस्थानों पर है, लेकिन मौजूदा सरकारी बजट विज्ञान और तकनीकि पर कुल बजट का
महज 0.9 प्रतिशत है। इस बजट से चीन जैसे तकनीकि और विज्ञान के महारथी से
प्रतिस्पर्धा करना अपना ही मजाक उड़ाना है, अत:
सूचना और प्रौद्योगिकी (आई टी सेक्टर) के विकास की अपार
संभावनाओं को देखते हुए प्रतिभाओं के प्रोत्साहन की जरुरत है। सूचना प्रौद्योगिकी
के युग में इस तकनीकि आधारित शिक्षा का महत्व दिन – प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।


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