देश की आत्मा
गांवों में बसती है.
गांवों
से जुड़ा हर भारतीय जो सुकून
गांवों में महसूस करता है,
उसे
शायद ही दुनिया
के किसी कोने में यह नसीब हो.
यही
वजह है संतोष सिंह जैसे तमाम
युवा प्रोफेशनल कॉरपोरेट
जिंदगी से ऊबकर गांवों में
जिंदगी की खुशियां तलाशने
आते हैं.
उद्यमिता
की तमाम संभावनाओं से भरे
ग्रामीण परिवेश में संतोष ने
डेयरी उद्योग में मील पत्थर
पार किया है.
आइये
जानते हैं आइटी प्रोफेशन में
शानदार कैरियर बनाने के बाद
डेयरी बिजनेस में सफल उद्यमी
के रूप में पहचान बनाने वाले
संतोष डी सिंह की सफलता की
कहानी...
हमारे देश में
कृषि और पशुपालन ग्रामीण
जीविकोपार्जन का सबसे बड़ा
साधन है.
देश में
पशुपालन मुख्यत:
डेयरी
उत्पादों को प्राप्त करने के
लिए किया जाता है.
मिल्क
प्रोडक्ट्स की मांग लगातार
बढ़ने से इस क्षेत्र में व्यवसाय
के नये-नये
रास्ते खुल रहे हैं.
एक अनुमान
के मुताबिक देश में डेयरी
मार्केट का अनुमानित कारोबार
4.3 लाख
करोड़ का है.
इंन्वेस्टर
रिलेशन सोसाइटी ऑफ इंडिया का
भी मानना है कि डेयरी मार्केट
लगभग 17
प्रतिशत
वार्षिक दर के साथ बढ़ रहा है.
यही वजह के
कॉरपोरेट सेक्टर में लंबा
अनुभव रखनेवाले प्रोफेशनल्स
भी डेयरी जैसे उद्यम में अपनी
किस्मत अजमा रहे हैं.
ओड़िशा,
कर्नाटक
और आंध्रप्रदेश सहित देश के
कई भागों में डेयरी उद्योग
के प्रति लोगों का रुझान बढ़
रहा है. इस
क्षेत्र में असीम संभावनाओं
को देेखते हुए संतोष डी सिंह
ने आइटी प्रोफेशन को छोड़कर
डेयरी उद्योग को चुनने का
फैसला किया.
मात्र तीन
गायों से सहारे डेयरी बिजनेस
की शुरुआत करनेवाले संतोष का
आज सलाना टर्नओवर एक करोड़
से ज्यादा है.आइटी सेक्टर से हुई कैरियर की शुरुआत
संतोष ने बेंगलुरु से इन्फॉरमेशन टेक्नोलॉजी में पोस्टग्रेजुएशन करने के बाद आइटी इंडस्ट्री की ओर रुख किया. इस दौरान डेल सहित बड़ी आइटी कंपनियों में 10 साल तक जॉब करने के दौरान दुनिया के कई देशों का दौरा किया. संतोष के मुताबिक उन दिनों भारत में आइटी इंडस्ट्री अपने शुरुआती चरण में थी. देश-विदेश की यात्रा के बीच संतोष को खुद का व्यवसाय शुरू करने का प्लान बनाया. योरस्टोरीडॉट की रिपोर्ट की मुताबिक संतोष कुछ ऐसा करना चाहते थे, जिसके जरिए वह हमेशा प्रकृति के नजदीक रहकर काम कर सकें. ऐसे में उनके दिमाग में डेयरी फार्मिंग का आइडिया आया. संतोष को महसूस हुआ कि भारतीय कृषि की अनिश्चितता को देखते हुए डेयरी फार्मिंग स्थिर और लाभदायक व्यवसाय है. पारिवारिक विचार-विमर्श के बाद संतोष ने अपनी जॉब छोड़ने का फैसला कर लिया.
एनडीआरआइ से ली ट्रेनिंग
आइटी सेक्टर में होने की वजह से संतोष के पास खेती-किसानी की प्रायोगिक जानकारी नहीं थी. ऐसे में व्यवसाय को नयी शक्ल देने के लिए उन्हें कई बड़ी और विपरीत चुनौतियों से निपटना था. डेयरी फारमिंग की बारीकियों को सीखने और अनुभव हासिल करने के लिए संतोष ने नेशनल रिसर्च डेयरी इंस्टीट्यूट (एनडीआरआइ) में प्रशिक्षण के लिए दाखिला ले लिया. इस दौरान संतोष ने पशुओं की देखभाल और प्रबंधन की जानकारी हासिल की. संतोष को कॉरपोरेट सेक्टर वर्कप्लेस में जो सुकून 10 में साल में नहीं मिला, वह डेयरी फार्म के खुले माहौल में उन्होंने महसूस किया. खेतों में रहकर काम करने से आत्मविश्वास बढ़ता गया और उन्हें यह महसूस हो गया कि पशुपालन एक आकर्षक पेशा है, जिसमें लंबे समय तक रहकर सुकून से कामयाबी की नयी ऊंचाइयों को छुआ जा सकता है.
कम पूंजी से हुई शुरुआत
संतोष ने अपने उद्यम अमृता डेयरी फार्म्स की शुरुआत मात्र तीन गायों के साथ की. डेयरी को चलाने के लिए संतोष ने करीब 20 लाख रुपये का बजट रखा. शुरुआत में गायों को नहलाने, दूध निकालने और साफ-सफाई संतोष खुद ही करते थे. एक साल में काम को तेजी से बढ़ाया, साल के अंत तक गायों की संख्या 20 हो गयी. संतोष को ट्रेनिंग देने वाले एनडीआरआइ के प्रशिक्षक भी नियमित तौर पर उनके फार्म पर आया करते थे. प्रशिक्षकों की सलाह पर संतोष ने तकनीकी मदद के लिए नाबार्ड का रुख किया. संतोष ने नाबार्ड के सहयोग और प्रोत्साहन से काम को और तेजी से बढ़ाया. धीरे-धीरे गायों की संख्या बढ़कर 100 हो गयी, जिससे रोजाना 1500 लीटर दुग्ध का उत्पादन होने लगा. बड़े पैमाने पर दूध उत्पादन होने से डेयरी का सलाना कारोबार एक करोड़ रुपये को पार कर गया. पिछले पांच वर्षों में आमदनी का स्तर लगातार बढ़ रहा है. काम को बढ़ाने में नाबार्ड के साथ-साथ स्टेट बैंक ऑफ मैसूर ने भी मदद की.
समस्याओं से भी किया मुकाबला
कामयाबी का रास्ता कभी भी आसान नहीं होता है. डेयरी फार्म में एक ओर कामयाबी मिल रही थी, वहीं सूखे जैसे कई समस्याओं से सामना करना पड़ा. डेढ़ साल के अकाल के दौरान पशुओं के लिए चारा इकट्ठा करना संतोष के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द था. बढ़ते पशुपालन खर्च के साथ प्रोडक्शन को बरकरार रखने के लिए संतोष ने कई तकनीकों को सहारा लिया. संतोष डेयरी को चलाने के लिए लंबी जद्दोजहद कर रहे थे, इस बीच छोटे-मोटे कई डेयरी फार्म बंद हो गये. पशुओं के चारे के लिए संतोष ने हरे चारे का उत्पादन करने का फैसला किया. उन्होंने हाइड्रोफोनिक्स यूनिट की स्थापना की, जिससे बाजार से कम कीमत पर हरा चारा उपलब्ध होने लगा. ऐसे कई प्रयासों ने संतोष को एक सफल एंटरप्रेन्योर के रूप में पहचान बनाने में मदद की.

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