गुरुवार, 23 जुलाई 2015

आइएएस के लिए आत्मविश्वास जरूरी

आइएएस में सफलता हासिल करना हर किसी का सपना होता है. इसके लिए देशभर के युवा लंबी जद्दोजहद करते हैं. लगभग डेढ़ साल तक चलने वाली देश की प्रतिष्ठित परीक्षा के लिए तैयारी करना और आत्मविश्वास बरकरार रख पाना किसी चुनौती से कम नहीं है.कुछ ऐसी चुनौतियों से निपट कर बेमिसाल कामयाबी हासिल की निशांत जैन ने.प्रस्तुत है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश...

यूपीएससी-2014 हिंदी माध्यम से आॅल इंडिया-13 रैंक. इस मुकाम को हासिल करने के लिए आपको बधाई. इस सफलता के प्रति कितना आश्वस्त थे आप और इसे किस नजरिये से देख
रहे हैं?
धन्यवाद, मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू देने के बाद मुझे लगने लगा था कि मेरा सेलेक्शन हो रहा है. लेकिन इतनी अच्छी रैंक की मुझे उम्मीद नहीं थी. मैं इस बात को इस तरह से लेता हूं कि अगर मेरी सफलता से हिंदी पट्टी और हिंदी माध्यम से तैयारी कर रहे छात्र, जिनके अंदर एक निराशा का भाव छाया हुआ है, उनमें एक अगर एक उम्मीद की किरण जगती है तो मेरे लिए इससे बड़ी कोई उपलब्धि नहीं है.
आपने हिंदी साहित्य में अकादमिक शिक्षा हासिल की है, नतीजतन आपने इसे वैकल्पिक विषय के रूप में चुना. इसके अलावा भी कोई ठोस वजह?
हां, मैनें हिंदी साहित्य से पढ़ाई की है. बीए में हिंदी नहीं था मेरे पास, लेकिन हिंदी के प्रति एक सहज रुचि थी और साहित्य के प्रति रुझान था. बचपन से ही कविताएं लिखा करता था. मुझे लगा यह मेरे लिए बेहतर होगा इसलिए इसकी पढ़ाई करनी चाहिए. मैंने एक बड़ा रिस्क भी लिया था क्योंकि अंगरेजी में कैरियर के विकल्प मिल जाते हैं, हिंदी में उतनी आसानी से नहीं मिल पाते हैं. लेकिन मुझे हमेशा से लगता था कि मैं इसमें अच्छा कर पाउंगा, अंतत: इसे वैकल्पिक विषयके रूप में चुना.
आमतौर पर यह धारणा है कि हिंदी माध्यम से कम अंक आते हैं. आपके लिखित के अंक देखें, तो आप पहली और दूसरी रैंक के बाद तीसरे सबसे अधिक स्कोर करने वाले कैंडिडेट हैं, इंटरव्यू में आपके अंक टॉप-50 में सबसे कम है. इस पर आपकी टिप्पणी.
मुझे बहुत खुशी है कि मुख्य परीक्षा में अंकों के लिहाज तीसरे स्थान पर हूं. इंटरव्यू में कुछ अंक और मिल जाते हैं, रैंक थोड़ी और ऊपर होती है. लेकिन मुझे खुशी है कि दोनों में मेरा प्रदर्शन बेहतर रहा. साक्षात्कार में हिंदी माध्यम चुनने का कोई प्रभाव नहीं पड़ा. बोर्ड बहुत सकारात्मक था. उन्होंने हिंदी और अंगरेजी में इंटरव्यू
देने का विकल्प दिया था. मैंने कहा था हिंदी को प्राथमिकता दूंगा. लेकिन अंगरेजी में साक्षात्कार देने में मुझे कोई दिक्कत नहीं है.
वैकल्पिक विषय के चुनाव को लेकर छात्रों में असमंजस की स्थिति रहती है. आपके अनुसार इसे चुनते हुए किन-किन बातों का ध्यान रखना जरूरी होता है. वैकल्पिक विषय की तैयारी शुरूकरने का सही समय कब होता है?
वैकल्पिक विषय चुनते समय सबसे पहले अपना रुझान देखना चाहिए. अभिरुचि को पहचानते हुए वैकल्पिक चुनें. ऐसे चुने हुए विषय को पढ़ने में आपको आनंद आयेगा और अच्छा प्रदर्शन कर पायेंगे. दूसरी बात, यह देख लें कि सिविल सेवाओं में उस विषय का प्रदर्शन कैसा है. वह विषय अंकदायी है या नहीं. वैकल्पिक विषय इतनी पकड़ होनी चाहिए कि आपको इसकी अलग सिरदर्दी न लेनी पड़े. स्नातक की पढ़ाई के दौरान ही विषय का अध्ययन इस तरह से करें कि बाद में असमंजस का सामना न करना पड़े. हां, अगर आप अलग से विषय
को चुन रहे हैं तो पहले बेसिक को मजबूत करें.
पहली बाधा प्रीलिम्स की होती है. हिंदी माध्यम के कैंडिडेट सीसैट और अंगरेजी की तैयारी करने और स्ट्रेटजी बनाने में ही काफी समय जाया कर देते हैं. इससे मुख्य परीक्षा की तैयारी पर भी असर पड़ता है. ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए क्या कुछ करना जरूरी होता है.

2015 से सीसैट क्वालीफाइंग हो गया है. अंगरेजी के अंक 2014 से ही नहीं जुड़ रहे हैं. अब प्रारंभिक और मुख्य
परीक्षा के तैयारी में काफी समानता आ गयी है. आपको प्रारंभिक में भी और मुख्य परीक्षा में भी सामान्य अध्ययन पर आपको जोर देना है. अंतर इतना ही है मुख्य परीक्षा में वैकल्पिक विषय की अलग से तैयारी करनी होगी. इससे हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में तैयारी करने वालों के लिए काफी सहूलियत हो गयी है.
 इस परीक्षा में सामान्य अध्ययन का दायरा काफी बढ़ गया है. इसकी तैयारी के लिए किन-किन माध्यमों का सहारा लेना चाहिए.
जीएस की तैयारी के लिए आपको बहुआयामी सोच विकसित करनी होगी. इसकी तैयारी के लिए किताबों
के अलावा रेडियो, टेलीविजन और इंटरनेट एक अच्छा स्रोत हैं. आॅल इंडिया रेडियो पर सामाचार विश्लेषण,
डीडी न्यूज आदि से प्रसारित होने वाले समाचार और कार्यक्रम तैयारी के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण हैं. हां, वेबसाइट से तैयारी करते समय प्रमाणिक स्रोतों पर ही भरोसा करें.
 अच्छे अंक के लिहाज से निबंध के पेपर की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है. निबंध की तैयारी के लिए कैसी होनी चाहिए योजना?
निबंध की तैयारी रातो-रात नहीं हो सकती. निबंध पूरी जिंदगी के अध्ययन और अनुभवों का निचोड़ है. निबंध
की तैयारी के लिए दीर्घकालीन रणनीति होनी चाहिए. इसके लिए आपको लगातार पढ़ने की आदत डालनी होगी. टेक्स्ट बुक के अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं, साहित्यिकपत्रिकाओं से अच्छी समझ विकसित
होती है. निबंध के लिए संतुलित दृष्टिकोण और समग्रता में अभिव्यक्त करने की शैली का होना जरूरी है. सूचना का भंडार उड़ेलने का नाम निबंध नहीं है. निबंध में बिल्कुल अलग प्रकार का प्रवाह होता है, इसको
जीएस की भांति नहीं लिखना चाहिए.
 अंतरराष्टÑीय मामलों से संबंधित कई प्रश्न पूछे जाते हैं. हिंदी माध्यम के छात्र, जो छोटे शहरों और कस्बों में रहकर तैयारी करते हैं, उनकों हिंदी में स्तरीय अध्ययन सामाग्री नहीं मिल पाती है. इन छात्रों को कैसी रणनीति अपनानी चाहिए.
भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पांच भाषाओं में है. इस पर सभी जानकारियां अपडेट हैं. इस पर
हर देश के साथ भारत के संबंधों की पूरी जानकारी उपलब्ध है. हिंदी माध्यम में अध्ययन सामाग्री उपलब्ध नहीं है, यह बात अब पुरानी हो चुकी है. अब हर कस्बे में इंटरनेट की सुविधा पहुंच चुकी है.
 काफी संख्या में छात्र कोचिंग का सहारा लेते हैं. इनमें से ज्यादातर कोचिंग से मिलने वाली अध्ययन सामाग्री पर ही निर्भर हो जाते हैं. यह प्रवृत्ति कितनी सही है?
कोचिंग सेंटर पर पूरी तरह से निर्भर नहीं होना चाहिए.कोचिंग अनिवार्य भी नहीं है, लेकिन यहां से मार्गदर्शन मिलता है, इसमें कोईसंदेह नहीं है. कोचिंग सेंटरों के स्टडी मैटीरियल पर पूर्ण रूप से निर्भर नहीं होना चाहिए. मीडिया के अलग-अलग माध्यमों से जानकारी हासिलकरते रहना चाहिए.
  आइएएस की तैयारी में काफी धैर्य और आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है. लंबे समय तक इसे कैसे बरकरार रखें. यह मेरे साथ भी रहा है, लगभग सभी को ऐसे स्थितियों से दो-चार होना पड़ता है. आइएएस की तैयारी और परीक्षा की प्रक्रिया काफी लंबी होती है, लेकिन विश्वास बना कर रखना जरूरी होता है. परिवार के साथ जुड़े रहें, वहां से आपको प्रेरणा मिलती रहेगी. दूसरा हमेशा एक वैकल्पिक रोजगार का विकल्प खुला रखें. मैं खुद नौकरी कर रहा था. आइएएस परीक्षा काफी डायनेमिक हो गयी, खुद को बंद कमरों में समेट कर तैयारी नहीं की जा सकती है                                           
 आइएएस की तैयारी कर रहे छात्र अलग-अलग पृष्ठिभूमि से आते हैं और अलग-अलग परिस्थितियों का सामना करते हैं. उनके लिए आपका सुझाव
इसके लिए जरूरी है आत्मविश्वास. अगर आपकी पृष्ठिभूमि बेहतर है आत्मविश्वास खराब तो आप कुछ
नहीं कर पायेंगे और आपकी स्थिति खराब और आत्मविश्वास बेहतर तो आप बहुत कुछ कर सकते हैं. पृष्ठिभूमि का असर तो पड़ता ही है, लेकिन एक सीमा तक, जहां तक आत्म विश्वास कम है.                                               निशांत जैन से साक्षात्कार दैनिक प्रभात खबर के अवसर में प्रकाशित हुआ था

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