गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

आधुनिक हिन्दी कविता की मौलिकता.....


आधुनिक हिन्दी कविता की मौलिकता.....
रसों और अलंकारों से सृजित होने वाली मर्मस्पर्शी हिन्दी कविता आधुनिकता की दौड़ में असहाय नजर आने लगी है। कविता ही नहीं, अपितु कवियों की सृजनात्मकता और पाठकों एवं श्रोताओं को सहज सौंदर्य बोध कराने की प्रवृत्ति दम तोड़ती हुई महसूस की जा सकती है। आधुनिक दौर में गद्य को पद्य और पद्य को गद्य बनाने की नई परंपरा शुरु हुई है। अतुकांत कवितायें कई सालों से प्रचलन में है, लेकिन भावपूर्ण शाब्दिक विन्यास और मार्मिक चित्रण का कविताओं से लुप्त हो जाना चिंतनीय है।
क्लिष्ठता का हवाला देकर संस्कृतनिष्ठ और मौलिक शब्दों को दूर कर देना ,नई बुद्धिमत्ता का प्रमाणपत्र लेने जैसा बन गया है। अब तो गेय पद और छंद बद्ध कविताओं की कल्पना करना भी मुश्किल हो रहा है। कभी- कभी कवि सम्मेलनों में हिन्दी कविताओं की ऐसी- तैसी करते हुए कुछ मूर्धन्य कवि गण नजर आते है।कुछ लफ्फ़ाजी के माध्यम से श्रोताओं से ताली बजवाने में अपनी साहित्यिक विद्वता का परिचय देते है,और समीक्षात्मक बहस में अपने आप को व्यंग्यकार की प्रतिमूर्ति बताते है।
लेकिन सही है कि गत् दशकों में आम बोल-चाल की भाषा से लेकर साहित्य लेखन तक शब्दकोश की भारी कमीं देखी जा रही है। कुछ स्थापित कविगण मंच पर एकजुट होकर आधुनिक कविता की मृत्युगीत गाते नजर आते हैं। सुधार के लिए या कुछ हो रहे सकारात्मक प्रयास के लिए भी वह तैयार नहीं हैं।
भारतीय फिल्मों की जहां तक बात है, गीतकीर को मर्यादा से मुक्त कर दिया गया है। इधर कविगण गीतकारों को सौतेला भाई मानकर हमेशा से गुर्राते आये है।गीतकारों के साथ यह समस्या है कि उन्हें एक परिधि के अंतर्गत काम करने के लिए विवश होना पड़ता है, इसके बावजूद साहिर लुधियानवी, मजरुह सुल्तान पुरी, कैफ़ी आज़मी, गुलज़ार, शैलेंद्र और समीर जैसे गीतकारों ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है।





बीते, 30 नवम्बर,को त्रिवेणी कला संगम नई दिल्ली में आधुनिक फिल्मों के सुप्रसिद्ध गीतकार इरशाद कामिल की पुस्तक समकालीन हिंदी कविता- समय और समाजके लोकार्पण के अवसर पर इस मुद्दे पर बातचीत हुई, उन्होंने भी अपनी इस पुस्तक में आधुनिक कविता के दर्द  को  भली प्रकार से महसूस किया है।
इस अवसर पर सुप्रसिद्ध हिन्दी के समालोचक साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने भी फिल्मों के गीतों के साथ आधुनिक कविता के वजूद पर प्रश्नचिन्ह लगाया।भारतीय विश्व विद्यालयों में हो रहे शोधपत्रों की विश्वशनीयता भी मौलिकता को आहत कर रही है। लोकगीत और कविता में लोक परंपरा अब बीते जमाने की बात हो चुकी है।  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें