सोमवार, 30 जनवरी 2012

कलियां मुस्काने लगी........



बसंत की रमणीय छटा छाने लगीं...
    पतझड़ों के बीच कलियां मुस्काने लगीं..
अतिमंद पवनों में विहग चहचहाने लगे ....
पुष्प गुच्छों पर भंवरे मंडराने लगे...
ओस की बूंदों से प्रभात् सुंदर...
रवि किरणों की लालिमा से छटा मनोहर..
तरुणाई पर लुटने लगी मदन की धरोहर...
सुगंधित पवनों में प्रकृति भी लजाने लगी...
बसंत की रमणीय छटा........................
नूतन कली निज खुशी दर्शाने आयी..
लगा यों कि पवन से आलिंगित हो आयी...
रजत कण ओस से पत्ते भी सौंदर्यित हो गये...
दृष्टि ऐसी विसरित हुई कि छटा से...
तन-मन आनंदित हो गये...
विहग कलरव से दिशाएं हुई सुमधुर...
हृद ने कहा ......
काश ......?
प्रकृति की होती हरदम ऐसी नजर......                   ----ब्रह्म आनंद मिश्र

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