भारतीय बाजार का
दायरा दिन-प्रतिदिन दायरा बढ़ता जा रहा है साथ ही
साथ प्रतिस्पर्धा भी कदम ताल कर रही है। विदेशी निवेश को लेकर चर्चाओं का
दौर काफी हाय-तौबा मचा चुका है, तरह –तरह के तर्क दिये गये और गढ़े गये। गुणवत्ता जैसे
मुद्दे पीछे अपना इंतजार करते रह गये । यह कठोर सत्य है कि विकास के नाम पर हमेशा हाथ
से काम और मुंह से निवाला छीना गया। तकनीकि विकास का हवाला देकर रोजगार को
बेरोजगार कर देना आम बात हो गयी है। छोटे-मोटे पैमानों पर जो काम हजारों हाथों को रोजगार देते थे, नई व्यवस्था ने
लगभग इसे खत्म कर दिया है। आम आदमी भी अपने हाथ से खाने- पीने से लेकर कॉस्मेटिक,
चूर्ण आदि घरेलू उपभोग की वस्तुओं का उत्पादन कर अपना रोजी –रोटी कमा लेता था
धीरे-धीरे बाजार की चमक-धमक ने इन सबको खत्म कर दिया। सुंदर विज्ञापनों से सजे ये
उत्पाद उपभोक्ताओं के दिलों-दिमाग में सहज तरीके से बैठ जाते है। पॉलिथीन में पैक
ये सामान अपेक्षाकृत जितने आकर्षक और मंहगे होते है ये उतने ही स्वास्थ्य के लिए
घातक होते है। और तो और ये पॉलिथीन उत्पाद को संरक्षित करने के बाद पर्यावरण को
जमकर भक्षित करते है। उपभोक्तावाद की भागम-भाग और दिखावे की दौड़ में पर्यावरणीय
असंतुलन के लिए सुरसा बन रही पॉलिथीन और
प्लॉस्टिक का कोई उपाय नहीं सोचा रहा है। आने वाले समय में ये इंसान , जीव-जंतु
सहित पेड़ – पौधों के लिए भी मुश्किलें खड़ी कर देगें।
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