बुधवार, 7 मार्च 2012


बसपा का सफाया, सपा ने रंग जमाया....
नता ने अपना फैसला सपा के पक्ष में दे कर, मायावती के लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के सपनों पर पानी फेर दिया है। आंधी का अंदेशा तो लग रहा था लेकिन सुनामी की कल्पना किसी ने नहीं की थी। मंगलवार की सुबह मतगणना प्रक्रिया शुरु होते ही लोगों के चेहरे की  रंगत भी बदलनी शुरु हो गयी थी। मायावती के पांच वर्ष के कार्यकाल में जनता ने तथाकथित दलित नेता के चेहरे को देख लिया।

 2007 में जब बसपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में आयी थी तो कारण बताया गया कि जनता गुण्डागर्दी के राज से  ऊब चुकी है । मायावती के आने के बाद एक हद तक आम लोगों को प्रशासन से सहायता भी मिलने लगी थी, इन सब के बावजूद पांच साल के घपलों – घोटालों ने माया सरकार को बेहद शर्मसार किया। दूसरी बात जो विचार करने योग्य है कि सरकार में महत्वपूर्ण मंत्री दागी निकले ,जिससे कि जनता का विश्वास उठता चला गया।
 कार्यकाल पूरा होते-होते एनएचआरएम घोटाला माया सरकार के लिए कोढ़ बन गया, सनसनी खेज मौतें हुई , रहस्य से अभी तक पर्दा नही उठ पाया। मायावती के करीबी माने जाने वाले बाबू सिंह कुशवाहा की घोटाले में संलिप्तता से बसपा की विश्वसनीयता प्रभावित हुई।
दूसरी ओर , सपा अखिलेश यादव के नेतृत्व में आम जनता के बीच अपना विश्वास बनाने में कामयाब हुई।  इस विधान सभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की राजनीति में दो युवा नेता राहुल गांधी और अखिलेश यादव पूरे जोश खरोश के साथ जन मानस से रुबरू हुए, एक को जनता ने सिरे से नकार दिया और दूसरे को सरताज बना दिया 

। पूरे चुनाव में मीडिया राहुल गांधी के साथ खड़ी रही, छोटी से छोटी जनसभा , रैली को कवरेज किया । इसके बावजूद जनता ने सिरे से नकार दिया , इस बात से यह स्पष्ट हो गया मीडिया जनमत निर्माण नही कर सकती। जनता जागरुक हो चुकी है,सरकार के पांच साल के कारनामों को वह कतई नजरअंदाज नहीं कर सकती ।
कांग्रेस के युवराज से कांग्रेस को ज्यादा उम्मीदें थी लेकिन जनता को उतनी उम्मीद नहीं थी कि जितनी कांग्रेस ने गलतफहमी पाल रखी थी।भाजपा उमा भारती की वापसी के बाद के बाद नये जोश से मैदान में उतरी थी । रिजल्ट आने के बाद भाजपा शायद इस बात पर गौर करेगी  कि चुनाव जोश से नहीं  बल्कि मुद्दों से जीते जाते है। बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल कर ऐन वक्त पर अपनी नैतिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा बैठे।
छोटे –मोटे दलों के मैदान में आने से इस बात के कयास लगाये जा रहे थे कि इससे सपा का नुकसान होगा । खासकर पीस पार्टी, उलेमा कांउसिल, कौमी एकता , अपना दल  में मुस्लिमों के वोट जाने का अनुमान लगाया जा रहा था लेकिन सब के सब प्रभावहीन हो गये। पश्चिमी यूपी में राष्ट्रीय लोकदल , कांग्रेस के साथ मिलने के बावजूद अनुमान के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाया।
बहर हाल जो भी हो जनता ने अपना पूर्ण समर्थन सपा को सौंप दिया, किसानों से लेकर विद्यार्थियों तक सबने अपनी उम्मीदें लगा रखी है। आने वाली सरकार इन उम्मीदों पर कितनी खरी उतरती है ये तो आने वाला वक्त ही बतायेगा।








  



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