भविष्य की राजनीतिक
अस्थिरता का केंद्र बनता यूपी।
विधानसभा के चुनाव
की आहट होते ही, विकास के नाम पर बंटवारे की सरगर्मियां तेज हो गयी है।सत्तारुढ़
बहुजन समाज पार्टी सहित सभी राजनीतिक पार्टियों को यूपी के विकास का एक ही रास्ता, बंटवारा नजर आ रहा है।हो भी क्यों न चुनावी माहौल में जनता
को झूठी दिलासा देने का काम पुराना रहा है।
इस घमासान में
तरह-तरह के तर्क दिये जा रहे है, लेकिन वास्तविकता क्या है ,शायद इस बात पर कोई
बहस करने के लिए तैयार नही है।अब विकास के नाम पर बंटवारे की पहल होगी,जिससे
राजनीतिक दिशा तय होगी।
चार बार की
मुख्यमंत्री रह चुकी मायावती को अचानक यूपी के
विकास का रास्ता
बंटवारा नजर आया।बिना किसी देरी के 21नवम्बर को शुरु होने वाले विधानसभा सत्र में
प्रस्ताव पारित कराने का संकल्प भी ले लिया।
परंतु इससे आगे भी विचार करने की जरुरत है। अंतत: यह प्रस्ताव केन्द्र के पाले में ही जायेगा।जहां
इसका समाधान हो पायेगा या महज तेलंगाना जैसा मुद्दा बनकर रह जायेगा, अभी कुछ कहने
में अतिशयोक्ति होगी।
वैसे जिन चार भागों
में बंटवारे को प्रस्तावित किया गया है, भाषाई,राजनीतिक और आर्थिक आधार पर काफी
विषमता है।जहां पश्चिमी उत्तर प्रदेश अपेक्षाकृत आर्थिक तौर पर संपऩ्न है, वहीं
पूर्वांचल और बुंदेलखण्ड आर्थिक पिछड़ेपन के शिकार है।
बुंदेलखण्ड के विकास
को लेकर राजनीतिक असंतोष पिछले कई वर्षों से लगातार बढ़ रहा है। कृषि और औद्योगिकरण
की प्रक्रिया लगभग नगण्य रही है,जिसकी वज़ह से बेरोज़गारी बढ़ी है।
पूर्वांचल की कमोबेश
स्थिति यही रही है, नतीजन रोजगार के लिए पलायन की समस्या बढ़ी है।क्या इन सब का उत्तर
प्रदेश से अलग करने पर ही विकास संम्भव है।
यह सर्वविदित है कि
चार नये प्रदेशों के निर्माण करने के लिए केंद्र पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा है। नई
समस्यायें उभर कर सामने आयेंगी, राजनीतिक अस्थिरता अपेक्षाकृत ज्यादा होगी।
चार राज्यों के
निर्माण में जो खर्च आयेगा, यदि उसका उपयोग राज्य के औद्योगिक करण, रोजगार निर्माण
में किया जाय तो इसमें क्या बुराई है।



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