लोगों को सवालों के
दायरे में खड़ी करने वाली मीडिया और कार्य के प्रति जबाबदेही पर प्रश्नचिन्ह लगाने
वाली अब खुद घिरती नजर आ रही है।एक साक्षात्कार में प्रेस काउंसिल के मुखिया
जस्टिस काटजू ने मीडिया में बढ़ रही गैर
जिम्मेदारी के प्रति अपना रोष जताया।
मीडिया पहले
पेड न्यूज और अब न्यूज रेगूलेशन को लेकर
चर्चा में है।मीडिया में विज्ञापन को न्यूज की तरह पेश करने का कार्यक्रम विगत् कई
वर्षों से जारी है।मीडिया में राजनीतिज्ञों और कार्पोरेट घरानों की दखलनदाजी की
काफी चर्चाएं- परिचर्चाएं हो चुकी है, अब मीडिया के नियंत्रण के लिए भी आवाजें
उठने लगी है। आज के दौर में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों मीडिया संदेहास्पद कार्य कर रहे है। खबरों को
सनसनीखेज और मसालेदार बनाने के लिए हद से गुजरने में जरा सा भी गुरेज़ नही करते। दर्शकों
और पाठको को उपभोक्ता मानकर खबर प्रेषित करने की परंपरा शुरु हो चुकी है।
मीडिया लोकतांत्रिक
व्यवस्था का आइना है।ये बातें सुनने में
जितनी अच्छी लगती है,अब वह वास्तविकता के धरातल पर कहीं टिकती नजर नहीं आ रही है।लोकतंत्र
के चीरहरण में भी कभी-कभी अपनी महती भूमिका निभाता है,इसका प्रत्यक्ष उदाहरण पेड
न्यूज के बदांयू के विधायक उमलेश यादव की बर्खास्तगी है। उत्तर प्रदेश के 2007 के
विधानसभा के चुनाव में उमलेश यादव ने अपने पक्ष में खबर छापने के लिए अख़बारों को
पैसा दिये ।इसमें दैनिक जागरण और अमर उजाला नैतिक तौर पर दोषी ठहराये जा चुके है।
इसके अलावा
महाराष्ट्र और झारखण्ड में भी विधान सभा चुनाव में ऐसे मामले पहले भी
चुके है, कोर्ट में सुनवाई चल रही है।लोकसभा और विधानसभा के चुनाव आते ही
चुनावी विज्ञापन के प्रसारण शुरु हो जाते है।विज्ञापन बाजार 20,000हजार करोड़ को पार कर चुका है। प्रेस परिषद में पेड न्यूज
से सम्बंधित शिकायतें दर्ज होती है, लेकिन निष्कर्ष जनता तक नही पहुच पाता।

आपने दो-तीन दिन पहले फेसबुक पे मीडिया के पक्ष में काफी कुछ लिखा था और मीडिया रेगुलेशन का पुरजोर विरोध किया था. क्या बात है जनाब यहाँ कुछ बदले-बदले से नज़र आ रहे हैं?
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