शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

कभी थीं फार्म मजदूर, आज आइटी कंपनी की सीइओ


अनाथालय में बचपन बितानेवाली ज्योति रेड्डी आज अनाथ बच्चों के लिए उम्मीद की किरण हैं. जिस विश्वविद्यालय ने कभी उन्हें नौकरी देने से मना कर दिया था, आज उसी विश्वविद्यालय में डिग्री के सेकेंड इयर के छात्र ज्योति के ऊपर लिखे गये अध्याय को पढ़ते हैं. ज्योति फर्श से अर्श तक पहुंचने की कहावत को चरितार्थ करती हैं. आइये जानते हैं ज्योति के इस प्रेरणादायक सफर को...
 ब्रह्मानंद मिश्र
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जहां चाह, वहां राह. यह हमारे लिए भले ही महज एक कहावत हो, लेकिन ज्योति रेड्डी के लिए उनके संघर्षपूर्ण कहानी का यह बेजोड़ शीर्षक है. बचपन में ही सिर से मां साया उठ गया. बचपन अनाथालय में बीता. मात्र 16 साल की उम्र में 10 साल बड़े व्यक्ति से शादी हो गयी, दो साल बाद 18 साल की आयु में दो बच्चियों की परवरिश की जिम्मेवारी. दिनभर की मजदूरी और शाम को कमाई के मिलते थे पांच रुपये. शाम को चूल्हा जलाकर खाना पकाना. ऐसी न जानें कितनी दुश्वारियों से गुजरते हुए ज्योति अमेरिका पहुंची. इन्हीं संघर्षों के बीच आया एक आइडिया, शुरू हुई एंटरप्रेन्योरशिप और ज्योति आज हैं प्रसिद्ध आइटी कंपनी की करोड़पति सीइओ. भले ही यह बॉलीवुड की किसी फिल्म की कहानी लग रही हो. लेकिन सच्चाई यही है.

बचपन बीता अनाथालय में
बेहद गरीब परिवार में जन्मी ज्योति पांच भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थी. बचपन में मां को खो देने के कारण अनाथालय परवरिश का सहारा बना. एक बार शिवरात्रि के दिन मंदिरों में होने वाले कार्यक्रम को देखने के लिए सहेलियों के साथ निकली ज्योति अनाथालय में आधी रात तक नहीं पहुंची. कार्यक्रम के बाद ज्योति वारंगल के किसी गांव में फिल्म देखने पहुंच गयी. देर रात वापस आने पर खूब डांट पड़ी. फिल्म से प्रेरित होकर ज्योति ने सोचा कि वह शादी प्रेम के लिए करेंगी. एक खूबसूरत जिंदगी का सपना बुनना शुरू भी नहीं हुआ था कि मात्र 16 साल की उम्र में उनकी शादी कर दी गयी. और इस तरह जिंदगी के सारे सपने धरे के धरे रह गये.

ज्योति 10वीं में तो फर्स्ट क्लास आयी थीं, लेकिन मुफलिसी ने आगे की पढ़ाई ही नहीं करने दी. पति 12वीं भी पास नहीं थे, रोजाना की जिंदगी चलाने के लिए बस एक ही सहारा था- दैनिक मजदूरी. तेलंगाना की तपती गरमी में धान के खेतों में मजदूरी करके ज्योति शाम तक बामुश्किल से पांच रुपये कमा पाती थीं. जिम्मेदारियां बढ़ती गयीं, 18 साल की उम्र में दो बच्चियों की मां बन गयीं. दिन भर की मजदूरी के बाद ज्योति को शाम को आकर परिवार के लिए लकड़ी जलाकर चूल्हे पर खाना भी पकाना पड़ता था. जिंदगी भले ही इम्तिहान ले रही थी, लेकिन ज्योति की सोच की इससे कहीं बड़ी व बुलंद थी और अंतत: वह विजेता बन कर उभरीं.

धीरे-धीरे जिंदगी ने ली करवट
ज्योति मेहनत-मजदूरी करके घर संभाल रही थीं. इस बीच उन्होंने नाइट स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया. जिंदगी बदली और वह मजदूर से सरकारी शिक्षक बन गयीं. ज्योति ने वारंगल के गांवों में घूम-घूमकर युवाओं और महिलाओं को कपड़ों की सिलाई-कढ़ाई सिखाने लगी. जॉब में प्रमोशन होने के बाद ज्योति महीने में 120 रुपये तक कमा लिया करती थीं. धीरे-धीरे उन्होंने एक लाख रुपये इकट्ठा कर लिया, जो उनके परिवार को चलाने और बच्चियों की देखभाल के लिए पर्याप्त रकम थी.

अमेरिका जाने का बना प्लान और मिली कामयाबी


आंबेडकर ओपेन यूनिवर्सिटी से वोकेशनल कोर्स करने के बाद ज्योति ने वारगंल की ककातिया यूनिवर्सिटी से अंगेरजी से एमए कोर्स में दाखिला लिया. वह सोचा करती थी कि उनके घर के नेमप्लेट पर लिखा हो- डॉ अनिला ज्योति रेड्डी. लेकिन किसी कारणवश एमए पूरा नहीं हो सका. इस बीच अमेरिका में रहनेवाले किसी रिश्तेदार उनकी मुलाकात हुई. उनकी सलाह पर ज्योति ने अमेरिका में नौकरी करने की योजना बना ली. इसके बाद ज्योति बकायदा हैदराबाद जाकर कंप्यूटर सॉफ्टवेयर क्लास करने लगीं. वर्ष 1994-95 के दौरान ज्योति का वेतन 5000 रुपये मासिक था. फिर उन्होंने चिट फंड का काम शुरू किया, जिससे वह 25000 रुपये प्रतिमाह तक काम लिया करती थीं.
किस्मत से मुकाबला करते हुए आखिरकार ज्योति अमेरिका पहुंच ही गयीं. हालांकि अच्छी अंगेरजी जानकारी और कोई सपोर्ट न होने के कारण दिक्कतें भी उठानी पड़ीं. वहां उन्होंने सेल्स गर्ल, रूम सर्विस पर्सन, गैस स्टेशन अटेंडेट, वरजीनिया में सॉफ्टवेयर रिक्रूटर जैसी कई नौकरियां कीं. उनके अनुसार पूर्व राष्ट्रपति कलाम ने उन्हें सलाह दी कि 11 साल से 16 साल के बीच बच्चों का चरित्र का निर्माण होता है. हालांकि इस उम्र में ज्योति अनाथालय में रहीं. लेकिन उन्होंने बच्चों की जिंदगी में इस आदर्श को उतारने का निर्णय लिया.

अपनी किस्मत खुद लिखो
ज्योति हर वर्ष 29 अगस्त को अपना जन्मदिन अनाथ बच्चों के मनाने के लिए भारत आती हैं. वह अनाथ बच्चे-बच्चियों के लिए कई योजनाएं चला रही हैं. महिलाओं के मुद्दे पर वह कहती हैं आत्मनिर्भर होना बहुत जरूरी है. वह कहती हैं बच्चों की देखभाल करना जिंदगी नहीं है, बल्कि जिंदगी का एक हिस्सा है. वह कहती हैं आगे बढ़ो और अपनी किस्मत खुद लिखो.

यह आलेख दैनिक प्रभात खबर के 24 सितंबर, 2015 के अंक में प्रकाशित हुआ था

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