प्रजनन के दिशा में तकनीकी प्रगति और अनिश्चितताएं
एक रिपोर्ट के अनुसार सात में एक महिला को गर्भधारण करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. ऐसे दंपति को मेडिकल साइंस का सहारा लेना पड़ता है. मेडिकल साइंस के अनुसार कई कारणों से बांझपन की समस्या आती है और यह समस्या महिला या पुरुष किसी के भी साथ हो सकती है. वर्ष 1970 में आइवीएफ (इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन) तकनीक आने के बाद बांझपन की समस्याओं से जूझ रहे दंपतियों को संतान प्राप्त करने की उम्मीद जगी थी. इसके बाद वर्ष 1990 में इंट्रासाइटोप्लाज्मिक स्पर्म इंजेक्शन (इस प्रक्रिया में शुक्राणुओं को अंत:क्षेपित किया जाता है) की तकनीक आयी. अब गर्भाशय प्रतिरोपण और इससे दुनिया के पहले बच्चे के जन्म ने मेडिकल साइंस की कामयाबी का नया अध्याय लिख दिया है.
गर्भधारण की मौजूदा तकनीकें-
इंट्रयूटरिन इंसेमनैशन (अंतरगर्भाशयी वीर्यरोपण): इस तकनीक में पुरुष के शुक्राणुओं को महिला के गर्भाशय में पहुंचाया जाता है. गर्भधारण में आने वाली अज्ञात समस्याओं या श्लेष्मा के बंद होने की दशा में यह तकनीक अपनायी जाती है. इस प्रक्रिया में स्पर्म बैंक से प्राप्त फ्रोजेन स्पर्म का भी इस्तेमाल किया जाता है. यूटरस तक शुक्राणुओं को पहुंचाने की प्रक्रिया में फाइन प्लास्टिक ट्यूब की मदद ली जाती है. अन्य तकनीकों के मुकाबले यह आसान तकनीक है. यह प्रक्रिया मंथली साइकिल के बीच में प्रयोग में लायी जाती है. गर्भधारण की संभावनाओं को मजबूत बनाने के लिए विशेष प्रकार की दवाओं को भी दिया जाता है. इस तकनीक के लिए महिला के पास स्वस्थ्य फैलोपियन ट्यूब्स होना चाहिए, जिसकी मदद से अंडाणु, अंडाशय से गर्भाशय तक पहुंचते हैं.
इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (आइवीएफ): इस तकनीक में निषेचन की प्रक्रिया शरीर के बजाये बाहर होती है. इन-विट्रो का मतलब होता है-ग्लास (जैसे-लेबोरेटरी डिश या टेस्ट ट्यूब).फैलोपियन ट्यूब्स के ब्लॉक होने या अज्ञात समस्याओं की दशा में आइवीएफ तकनीक प्रयोग में लायी जाती है. इस तकनीक में ओवरीज में अंडाणुओं को बढ़ाने के लिए विशेष प्रकार की दवाएं दी जाती हैं. परिपक्व अंडाणुओं को निकालकर शुक्राणुओं के संपर्क में लाया जाता है. लेबोरेटरी डिश में तैयार किये जाने वाला यह मिश्रण कुछ दिनों के लिए छोड़ दिया जाता है. इस दौरान अंडाणुओं को शुक्राणु निषेचित कर देते हैं, जिससे भ्रूण तैयार होता है. इस प्रकार तैयार भ्रूण को फाइन प्लास्टिक ट्यूब के माध्यम से महिला के गर्भाशय में प्रतिरोपित कर दिया जाता है. 39 वर्ष से कम आयु की महिलाओं व पहले गर्भधारण कर चुकी महिलाओं में आइवीएफ के सफल होने की संभावना अपेक्षाकृत ज्यादा रहती है.
गैमिट इंट्राफैलोपियन ट्रांसफर (गिफ्ट): आइवीएफ तकनीक की ही तरह अंडाणु व शुक्राणु के युग्मक को इकट्ठा किया जाता है. इस प्रकार तैयार मिश्रण को महिला के फैलोपियन ट्यूब में प्रतिरोपित कर दिया जाता है. आइवीएफ तकनीक में निषेचन की प्रक्रिया लेबोरेटरी डिश में होती है, जबकि इस तकनीक में निषेचन की प्रक्रिया प्राकृतिक ढंग से महिला के फैलोपियन ट्यूब या गर्भाशय में होती है.
इंट्रासाइटोप्लाज्मिक स्पर्म इंजेक्शन (आइसीएसआइ): इस तकनीक में व्यक्ति विशेष के शुक्राणुओं को अंडाणुओं के बाहरी हिस्सों (कोशिका-द्रव्य) पर प्रतिरोपित कर दिया जाता है. शुक्राणु कई मामलों में अंडाणुओं के बाहरी हिस्सों को नहीं भेद पाते हंै-जिसकी वजह से अंडाणुओं का निषेचन नहीं हो पाता है. शुक्राणुओं की संख्या कम होने की दशा में भी आइसीएसआइ तकनीक प्रयोग में लायी जाती है. जरूरत पड़ने पर शुक्र ग्रंथि से भी आॅपरेशन कर शुक्राणुओं को प्राप्त किया जाता है. शुक्राणु धारण करने वाले ऐसे अंडाणुओं को आइवीएफ तकनीक की तरह गर्भाशय में प्रतिरोपित किया जाता है. अनुर्वरता या बांझपन :
यह प्रजनन प्रणाली की बीमारी है. एक वर्ष तक प्रयास करते रहने के बाद भी अगर गर्भधारण नहीं होता है तो उसे अनुर्वरता कहते हैं. यह स्थिति केवल स्त्री के कारण नहीं होती. केवल एक तिहाई मामलों में ही अनुर्वरता स्त्री के कारण होती है. एक तिहाई मामलों में यह पुरुष के कारण होती है. जबकि शेष एक तिहाई में स्त्री और पुरुष के मिले-जुले कारणों से या अज्ञात कारणों से होती है.
बांझपन के कारण :
पुरुषों में प्रजनन क्षमता में कमी का सबसे सामान्य कारण शुक्राणु का कम या नहीं होना है. कभी-कभी शुक्राणु का गड़बड़ होना या अंडों तक पहुंचने से पहले ही उसका मर जाना भी एक कारण होता है. महिलाओं में बांझपन का सबसे सामान्य कारण मासिक-चक्र में गड़बड़ी है. इसके अलावा गर्भ-नलिकाओं का बंद होना, गर्भाशय में विकृति या जननांग में गड़बड़ी के कारण भी अक्सर गर्भपात हो सकता है.
गर्भधारण कैसे होता है :
यह एक जटिल प्रक्रिया है, जो कई बातों पर निर्भर करती है- पुरुष द्वारा स्वस्थ शुक्राणु तथा महिला द्वारा स्वस्थ अंडों का उत्पादन, अबाधित गर्भ नलिकाएं ताकि शुक्राणु बिना किसी रुकावट के अंडों तक पहुंच सके, मिलने के बाद अंडों को निषेचित करने की शुक्राणु की क्षमता, निषेचित अंडे की महिला के गर्भाशय में स्थापित होने की क्षमता तथा गर्भाशय की स्थिति आदि. अंत में गर्भ के पूरी अवधि तक जारी रखने के लिए गर्भाशय का स्वस्थ होना और भ्रूण के विकास के लिए महिला के हारमोन का अनुकूल होना जरूरी है. इनमें से किसी एक अंग या प्रक्रिया में विकृति आने का परिणाम बांझपन के रूप में सामने आ सकता है.
संतानहीनता से बचने के लिए जीवनशैली में लाएं बदलाव
आधुनिक जीवनशैली की वजह से उपजनेवाली समस्याओं में संतानहीनता भी एक प्रमुख समस्या है. इस समस्या से बचने के लिए कुछ सावधानियां जरूरी हैं.
- नियमित रूप से व्यायाम करें और वजन संतुलित रखें.
- लड़कियों को 26-27 वर्ष की उम्र तक शादी कर लेनी चाहिए, ताकि 30 वर्ष की उम्र तक पहली संतान को जन्म दे सकें.
- अगर तीस की उम्र से पहले शादी होने के बावजदू 32-33 की उम्र तक कोई स्त्री गर्भधारण न कर पायी, तो स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए, क्योंकि आमतौर पर 35 की उम्र के बाद ओवरीज में कमियां आने लगती हैं, जिसका असर हर माह रिलीज होनेवाले एग्स पर पड़ता है.
- शादी के बाद पति-पत्नी दोनों ही धूम्रपान और शराब के सेवन से बचें.
- डॉक्टरी सलाह के लिए अच्छे इन्फर्टिलिटी क्लिनिक से संपर्क करें, जहां आधुनिक जांच की सुविधाएं मौजूद हों.
-इस लेख का कुछ अंश दैनिक प्रभात खबर में प्रकाशित हुआ था.
एक रिपोर्ट के अनुसार सात में एक महिला को गर्भधारण करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. ऐसे दंपति को मेडिकल साइंस का सहारा लेना पड़ता है. मेडिकल साइंस के अनुसार कई कारणों से बांझपन की समस्या आती है और यह समस्या महिला या पुरुष किसी के भी साथ हो सकती है. वर्ष 1970 में आइवीएफ (इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन) तकनीक आने के बाद बांझपन की समस्याओं से जूझ रहे दंपतियों को संतान प्राप्त करने की उम्मीद जगी थी. इसके बाद वर्ष 1990 में इंट्रासाइटोप्लाज्मिक स्पर्म इंजेक्शन (इस प्रक्रिया में शुक्राणुओं को अंत:क्षेपित किया जाता है) की तकनीक आयी. अब गर्भाशय प्रतिरोपण और इससे दुनिया के पहले बच्चे के जन्म ने मेडिकल साइंस की कामयाबी का नया अध्याय लिख दिया है.
गर्भधारण की मौजूदा तकनीकें-
इंट्रयूटरिन इंसेमनैशन (अंतरगर्भाशयी वीर्यरोपण): इस तकनीक में पुरुष के शुक्राणुओं को महिला के गर्भाशय में पहुंचाया जाता है. गर्भधारण में आने वाली अज्ञात समस्याओं या श्लेष्मा के बंद होने की दशा में यह तकनीक अपनायी जाती है. इस प्रक्रिया में स्पर्म बैंक से प्राप्त फ्रोजेन स्पर्म का भी इस्तेमाल किया जाता है. यूटरस तक शुक्राणुओं को पहुंचाने की प्रक्रिया में फाइन प्लास्टिक ट्यूब की मदद ली जाती है. अन्य तकनीकों के मुकाबले यह आसान तकनीक है. यह प्रक्रिया मंथली साइकिल के बीच में प्रयोग में लायी जाती है. गर्भधारण की संभावनाओं को मजबूत बनाने के लिए विशेष प्रकार की दवाओं को भी दिया जाता है. इस तकनीक के लिए महिला के पास स्वस्थ्य फैलोपियन ट्यूब्स होना चाहिए, जिसकी मदद से अंडाणु, अंडाशय से गर्भाशय तक पहुंचते हैं.
इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (आइवीएफ): इस तकनीक में निषेचन की प्रक्रिया शरीर के बजाये बाहर होती है. इन-विट्रो का मतलब होता है-ग्लास (जैसे-लेबोरेटरी डिश या टेस्ट ट्यूब).फैलोपियन ट्यूब्स के ब्लॉक होने या अज्ञात समस्याओं की दशा में आइवीएफ तकनीक प्रयोग में लायी जाती है. इस तकनीक में ओवरीज में अंडाणुओं को बढ़ाने के लिए विशेष प्रकार की दवाएं दी जाती हैं. परिपक्व अंडाणुओं को निकालकर शुक्राणुओं के संपर्क में लाया जाता है. लेबोरेटरी डिश में तैयार किये जाने वाला यह मिश्रण कुछ दिनों के लिए छोड़ दिया जाता है. इस दौरान अंडाणुओं को शुक्राणु निषेचित कर देते हैं, जिससे भ्रूण तैयार होता है. इस प्रकार तैयार भ्रूण को फाइन प्लास्टिक ट्यूब के माध्यम से महिला के गर्भाशय में प्रतिरोपित कर दिया जाता है. 39 वर्ष से कम आयु की महिलाओं व पहले गर्भधारण कर चुकी महिलाओं में आइवीएफ के सफल होने की संभावना अपेक्षाकृत ज्यादा रहती है.
गैमिट इंट्राफैलोपियन ट्रांसफर (गिफ्ट): आइवीएफ तकनीक की ही तरह अंडाणु व शुक्राणु के युग्मक को इकट्ठा किया जाता है. इस प्रकार तैयार मिश्रण को महिला के फैलोपियन ट्यूब में प्रतिरोपित कर दिया जाता है. आइवीएफ तकनीक में निषेचन की प्रक्रिया लेबोरेटरी डिश में होती है, जबकि इस तकनीक में निषेचन की प्रक्रिया प्राकृतिक ढंग से महिला के फैलोपियन ट्यूब या गर्भाशय में होती है.
इंट्रासाइटोप्लाज्मिक स्पर्म इंजेक्शन (आइसीएसआइ): इस तकनीक में व्यक्ति विशेष के शुक्राणुओं को अंडाणुओं के बाहरी हिस्सों (कोशिका-द्रव्य) पर प्रतिरोपित कर दिया जाता है. शुक्राणु कई मामलों में अंडाणुओं के बाहरी हिस्सों को नहीं भेद पाते हंै-जिसकी वजह से अंडाणुओं का निषेचन नहीं हो पाता है. शुक्राणुओं की संख्या कम होने की दशा में भी आइसीएसआइ तकनीक प्रयोग में लायी जाती है. जरूरत पड़ने पर शुक्र ग्रंथि से भी आॅपरेशन कर शुक्राणुओं को प्राप्त किया जाता है. शुक्राणु धारण करने वाले ऐसे अंडाणुओं को आइवीएफ तकनीक की तरह गर्भाशय में प्रतिरोपित किया जाता है. अनुर्वरता या बांझपन :
यह प्रजनन प्रणाली की बीमारी है. एक वर्ष तक प्रयास करते रहने के बाद भी अगर गर्भधारण नहीं होता है तो उसे अनुर्वरता कहते हैं. यह स्थिति केवल स्त्री के कारण नहीं होती. केवल एक तिहाई मामलों में ही अनुर्वरता स्त्री के कारण होती है. एक तिहाई मामलों में यह पुरुष के कारण होती है. जबकि शेष एक तिहाई में स्त्री और पुरुष के मिले-जुले कारणों से या अज्ञात कारणों से होती है.
बांझपन के कारण :
पुरुषों में प्रजनन क्षमता में कमी का सबसे सामान्य कारण शुक्राणु का कम या नहीं होना है. कभी-कभी शुक्राणु का गड़बड़ होना या अंडों तक पहुंचने से पहले ही उसका मर जाना भी एक कारण होता है. महिलाओं में बांझपन का सबसे सामान्य कारण मासिक-चक्र में गड़बड़ी है. इसके अलावा गर्भ-नलिकाओं का बंद होना, गर्भाशय में विकृति या जननांग में गड़बड़ी के कारण भी अक्सर गर्भपात हो सकता है.
गर्भधारण कैसे होता है :
यह एक जटिल प्रक्रिया है, जो कई बातों पर निर्भर करती है- पुरुष द्वारा स्वस्थ शुक्राणु तथा महिला द्वारा स्वस्थ अंडों का उत्पादन, अबाधित गर्भ नलिकाएं ताकि शुक्राणु बिना किसी रुकावट के अंडों तक पहुंच सके, मिलने के बाद अंडों को निषेचित करने की शुक्राणु की क्षमता, निषेचित अंडे की महिला के गर्भाशय में स्थापित होने की क्षमता तथा गर्भाशय की स्थिति आदि. अंत में गर्भ के पूरी अवधि तक जारी रखने के लिए गर्भाशय का स्वस्थ होना और भ्रूण के विकास के लिए महिला के हारमोन का अनुकूल होना जरूरी है. इनमें से किसी एक अंग या प्रक्रिया में विकृति आने का परिणाम बांझपन के रूप में सामने आ सकता है.
संतानहीनता से बचने के लिए जीवनशैली में लाएं बदलाव
आधुनिक जीवनशैली की वजह से उपजनेवाली समस्याओं में संतानहीनता भी एक प्रमुख समस्या है. इस समस्या से बचने के लिए कुछ सावधानियां जरूरी हैं.
- नियमित रूप से व्यायाम करें और वजन संतुलित रखें.
- लड़कियों को 26-27 वर्ष की उम्र तक शादी कर लेनी चाहिए, ताकि 30 वर्ष की उम्र तक पहली संतान को जन्म दे सकें.
- अगर तीस की उम्र से पहले शादी होने के बावजदू 32-33 की उम्र तक कोई स्त्री गर्भधारण न कर पायी, तो स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए, क्योंकि आमतौर पर 35 की उम्र के बाद ओवरीज में कमियां आने लगती हैं, जिसका असर हर माह रिलीज होनेवाले एग्स पर पड़ता है.
- शादी के बाद पति-पत्नी दोनों ही धूम्रपान और शराब के सेवन से बचें.
- डॉक्टरी सलाह के लिए अच्छे इन्फर्टिलिटी क्लिनिक से संपर्क करें, जहां आधुनिक जांच की सुविधाएं मौजूद हों.
-इस लेख का कुछ अंश दैनिक प्रभात खबर में प्रकाशित हुआ था.


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