ब्रह्मानंद मिश्र
हृदय यानी दिल एक ऐसा शब्द है, जो साइंस से लेकर साहित्य तक, कला से लेकर संगीत तक, समाज से लेकर संस्कृति तक, हर जगह मौजूद है. आपका दिल बड़ा है, उनका हृदय परिवर्तित हो गया, दिल टूट गया, ये बातें दिल पर लगती हैं, इस काम में दिल नहीं लगता है- जैसे तमाम वाक्य शायद दिल की अहमियत बताने के लिए काफी हैं.हृदय है तो ही जिंदगी है, जिंदगी भी तभी है, जब आपके पास स्वस्थ्य हृदय है. अस्वस्थ्य हृदय, बीमारियों का कारण बनता है. कई बार तो यही बीमारियां इंसान को जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर पहुंचा देती हैं. हृदयघात (हार्ट अटैक) जैसी बीमारियां तो कुछ पल में ही हंसती-खेलती जिंदगी छीन लेती हैं. दुनियाभर में होनेवाली मौतों में करीब एक-चौथाई हृदय संबंधी बीमारियों के चलते होती हैं. मेडिकल साइंस इन समस्याओं से निजात के लिए नयी-नयी तकनीकों का सहारा लेता है. ऐसी ही एक महत्वपूर्ण तकनीक है- हृदय प्रत्यारोपण की. ऑस्ट्रेलियाई डॉक्टरों की टीम ने मृत हृदय को प्रत्यारोपित करने में कामयाबी हासिल की है. इस प्रकार का यह दुनिया का पहला सफल हृदय प्रत्यारोपण है.
* 20 मिनट में फिर से धड़क उठा दिल
अब तक हृदय प्रत्यारोपण की प्रक्रिया में ब्रेन डेड व्यक्ति के शरीर से धड़कते हृदय को ऑपरेशन कर निकाला जाता था. लेकिन, ऑस्ट्रेलिया के सेंट विंसेंट हॉस्पिटल सिडनी में डॉक्टरों की टीम ने धड़कन बंद हो जाने के बाद ऑपरेशन कर निकाले गये हार्ट को विशेष सॉल्यूशन (घोल) में रखा, जिसे विक्टर चांग कॉर्डिएक रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा तैयार किया गया था. खास बात यह रही कि 20 मिनट तक ह्यमृतह्ण रहने के बावजूद डॉक्टरों को टीम ने हार्ट को फिर से चालू कर उसे प्रत्यारोपित करने में कामयाबी हासिल की, जो इस प्रकार का दुनिया का पहला केस है. विशेषज्ञों का मानना है कि प्रिजरवेटिव के रूप में इस्तेमाल किया जानेवाला विशेष सॉल्यूशन हार्ट को चार घंटे तक डैमेज होने से बचा सकता है. सेंट विंसेंट हॉस्पिटल के मुताबिक, इस सॉल्यूशन की मदद से 30 प्रतिशत जिंदगी को बचाया जा सकता है.उम्मीद की जा रही है कि इस सॉल्यूशन की मदद से धड़कन बंद हो चुके हार्ट को फिर से चालू करने में मिली कामयाबी से हार्ट डोनर की संख्या बढ़ सकती है, जिससे दुनियाभर में ज्यादा से ज्यादा मरीजों का इलाज संभव हो सकेगा. ह्यडेली मेलह्ण की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस सॉल्यूशन को तैयार करने में 12 वर्ष से अधिक का वक्त लग गया है. इस सॉल्यूशन से बंद हृदय (हर्ट डोनेटेड ऑफ्टर सर्कुलेटरी डेथ यानी डीसीडी) को फिर चालू करने और फंक्शन को बेहतर बनाने में भी सहायता मिलेगी.इस तकनीक में डॉक्टर मरीजों के हार्ट को जिंदा रखने और धड़कने के लिए लाइफ सपोर्ट मशीन पर रखते हैं और डोनर मरीज से हार्ट को सीधे ट्रांसमेडिक्स मशीन में रखा जाता है. हालांकि, इस दौरान हार्ट पंप करता रहता है, लेकिन ऑर्गन में मामूली नुकसान होता है. माना जा रहा है कि इस सॉल्यूशन की मदद से हार्ट की प्रक्रिया को बेहतर बनाये रखने में काफी सहूलियत मिलेगी.
* तकनीकी विकास से और बढ़ीं उम्मीदें
विशेषज्ञ डॉक्टरों का अगला लक्ष्य अब यह होगा कि एक बार बंद हो चुके हार्ट को न केवल चालू किया जा सके, बल्कि ज्यादा देर से बंद रहे हार्ट को भी चालू किया जा सके. यानी फिलहाल जो 20 मिनट तक पूरी तरह से बंद रहे हार्ट को चालू करने में कामयाबी पायी गयी है, उस समय को काफी बढ़ाया जा सके और कई घंटों से बंद रहे हार्ट को भी फिर से चालू करने में कामयाबी पायी जा सके.दरअसल, इस दौरान हार्ट में ऑक्सीजन की कमी होने का खतरा बढ़ जाता है, जिससे हार्ट डैमेज होने की प्रबल संभावनाएं रहती हैं. इससे खराब हो चुके हार्ट को ट्रांसप्लांट नहीं किया जा सकता है. लेकिन हार्ट में इस नये सॉल्यूशन को इंजेक्ट करने के बाद सेल रिजेनरेट होनी शुरू हो जाती है. इस प्रकार हार्ट को कुछ घंटों तक सुरक्षित रखा जा सकता है, जिसे मरीज में ट्रांसप्लांट किया जा सकता है.
उत्तरी अमेरिका और यूरोप के कुछ देशों में हार्ट ट्रांसप्लांटेशन की दिशा में नयी तकनीकों को विकसित करने के लिए रिसर्च चल रही है. ऑस्ट्रेलिया के सेंट विंसेंट हॉस्पिटल सिडनी में ट्रांसप्लांटेशन की प्रक्रिया में शामिल डॉ पॉल जांस्ज के मुताबिक, पिछले वर्ष इस तकनीक के प्रमाणित होने के बाद अब तक तीनों मरीजों में हार्ट ट्रांसप्लांट किया जा चुका है. ट्रांसप्लांट के बाद दो मरीजों की जिंदगी सामान्य हो चुकी है, जबकि तीसरा मरीज अभी इलाज की प्रक्रिया से गुजर रहा है. ऑपरेशन में शामिल भारतीय मूल के डॉक्टर कुमुद धीतल के मुताबिक, हार्ट ट्रांसप्लांट प्रक्रिया के दौरान हार्ट इन ए बॉक्स मशीन का इस्तेमाल किया गया, जिसे एक्सवायवो ऑर्गन केयर सिस्टम कहते हैं. हार्ट लंग ट्रासप्लांट यूनिट के डायरेक्टर प्रोफेसर मैकडोनाल्ड के मुताबिक, डॉक्टरों की टीम इस प्रोजेक्ट पर पिछले 20 वर्षों से काम कर रही थी. पिछले चार वर्षों में अपेक्षाकृत काम में तेजी लायी गयी, जिससे यह सपना साकार हो सका.
* हार्ट फेल होने के कारण और लक्षण
हार्ट फेल होने के कई कारण हो सकते हैं. ज्यादातर मामलों में हार्ट के पंप करने में आने वाली बाधा ही बड़ा कारण बनती है. जैसे-हाइ ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप) होने पर हार्ट मसल इंजुरी होने पर हार्ट-अटैक हो जाता है या कॉरोनरी हार्ट डिजीज की समस्या उत्पन्न हो जाती है. रक्तधमनियों के संकरा हो जाने या रक्त की आपूर्ति बंद हो जाने पर कोरोनरी हार्ट डिजीज की समस्या उत्पन्न हो जाती है. इन्हीं कारणों से पंप करने की क्षमता में होने वाली गिरावट की वजह से हार्ट फेल होने के मामले सामने आते हैं. शुरुआती दौर में हार्ट के पंपिंग क्षमता में होने वाली गिरावट का स्पष्ट रूप से असर नहीं दिखता है.
मेडिकल विशेषज्ञों के मुताबिक, फ्ल्यूड ओवरलोड (फेफड़ों समेत शरीर के आंतरिक अंगों को प्रभावित करने वाला तरल पदार्थ) भी हार्ट फेलियर का कारण हो सकता है. फ्ल्यूड ओवरलोड की समस्या आम तौर पर सांस लेने में दिक्कतों की वजह से होती है, जिसे डिस्प्नीय कहा जाता है. लगातार कफ बनने और सांस संबंधी बीमारियों से भी फ्ल्यूड ओवरलोड हो सकता है. ऐसी दशा में पेट सहित शरीर के कई हिस्सों में सूजन आ सकती है.दूसरी जो समस्या आती है, वह है ऑक्सीजन की कमी. शुरुआती दौर में शारीरिक कार्यों में जल्दी थकावट आना, मांसपेशियों का दुखना, फेफड़ों में दर्द होना आदि ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की कमी होने के लक्षण हैं. ऐसी दशा में रक्त का संचार अपेक्षाकृत धीमा पड़ जाता है, जिससे हृदय सुचारु रूप से पंप नहीं कर पाता है. इसके अलावा भी कई अन्य आंतरिक एवं बाह्य समस्याएं हार्ट फेल होने का कारण बनती हैं.
* हार्ट फेल होने के प्रमुख कारण और हृदय संबंधी बीमारियां
पैदाइशी हृदय संबंधी बीमारी (कॉन्जेंटल हार्ट डिजीज) : यह बीमारी जन्मजात होती है व बड़े होने पर समस्याएं और भी जटिल हो जाती हैं. इसमें मरीज की हृदयगत संरचना त्रुटिपूर्ण होती है. विशेषकर धमनियों और शिराओं की संरचना दोषपूर्ण होने के कारण हार्ट फंक्शन प्रभावित होता है. वाल्व संकरा होने से रक्त संचार बाधित होता है.
* हृदय मांसपेशी से जुड़ी बीमारी (कॉर्डियोमायोपैथी) : दुनियाभर में सालाना इस बीमारी से जुडे़ लाखों नये मामले प्रकाश में आते हैं. इस बीमारी में सीधे तौर पर मांसपेशियां क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, जिसकी वजह से हृदय पर्याप्त ब्लड को पंप नहीं कर पाता है और शरीर में ब्लड सप्लाई बाधित हो जाती है. प्राइमरी कॉर्डियोमायोपैथी में हृदय मांसपेशियों की संरचना व क्रियाविधि प्रभावित होती है. सेकेंडरी कॉर्डियोमायोपैथी में हृदय के साथ शरीर के अन्य अंग भी प्रभावित हो जाते हैं, जो बड़ी बीमारी का कारण बन सकता है.
* रक्तसंकुलता से हृदय की बीमारी (कंजेस्टिव हार्ट फेलियर) : इस बीमारी में हृदय शरीर के ऊतकों के लिए पर्याप्त रक्त की आपूर्ति नहीं कर पाता है. इससे शिराओं द्वारा पर्याप्त रक्त नहीं पहुंच पाता है. हृदय की क्रियाविधि प्रभावित होने से शरीर के ऊतकों में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है. सांस लेने में दिक्कत, जोड़ों पर सूजन और वजन बढ़ना इसके प्रमुख लक्षण हैं.
* हृदय की धमनी की बीमारी (कॉरोनरी आर्टरी डिजीज) : यह हृदय से जुड़ी सबसे बड़ी बीमारी मानी जाती है. इस बीमारी में धमनियों के संकुचित हो जाने से हृदय की मांसपेशियों में बदलाव होने लगता है. तनाव और कठोर परिश्रम करते हुए एक या एक से अधिक धमनियों के संकुचित होने का खतरा रहता है.
* नत्ररक्तवाहक छिद्र से हृदय रोग (वाल्वुलर डिजीज) : हृदय में होनेवाली यह बीमारी जन्मजात, गठियारोग (रुमैटिक फीवर) या रुमैटिक हार्ट डिजीज की वजह से हो सकती है. इस बीमारी में शरीर को रक्त की आपूर्ति करने के लिए हार्ट ज्यादा पंप करना पड़ता है, जिससे हार्ट मसल के डैमेज होने का खतरा रहता है.
(स्रोत : डिपार्टमेंट ऑफ सर्जरी, कोलंबिया यूनिवर्सिटी)
* दुनिया भर में ट्रांसप्लांट के लिए बढ़ेगी हार्ट की उपलब्धता
- एक्सपर्ट व्यू
।। डॉ सुशांत श्रीवास्तव ।।
(सीनियर कंसल्टेंट एंड डायरेक्टर, कार्डियोथोरेसिस एंड वैस्कुलर सर्जरी, बीएलके हॉस्पिटल, दिल्ली)
किसी इंसान के शरीर में केवल एक ही हार्ट होता है. जिंदा व्यक्ति का हार्ट नहीं निकाला जा सकता है, अन्यथा उसकी मौत हो जायेगी. शरीर में दो किडनी होती है, इसलिए जिंदा व्यक्ति किडनी को दान कर सकता है. लेकिन ट्रांसप्लांट के लिए हार्ट को डोनेट नहीं किया जा सकता है. केवल ब्रेन डेथ होने की स्थिति में ही हार्ट को निकाला जा सकता है. जैसे किसी व्यक्ति को ब्रेन ट्यूमर होने या फिर एक्सीडेंट होने या सिर में गंभीर चोट लगने से यदि कोई व्यक्ति कोमा में चला गया और उसके अचेत अवस्था से बाहर निकलने की कोई संभावना नहीं है, तो सामान्य बोलचाल की भाषा में इसे ब्रेन डेथ कहा जाता है. चूंकि चोट या बीमारी सिर्फ ब्रेन में होती है, इसलिए हार्ट काम करता रहता है. उसमें ब्लड प्रेशर भी होता है और रक्त संचार जारी रहता है. ऐसी स्थिति में व्यक्ति का हार्ट निकाल लिया जाता है.
ऑस्ट्रेलिया में किये गये हालिया हार्ट ट्रांसप्लांट के मामले में ब्रेन डेड मरीज का हार्ट भी रुक गया था और डॉक्टरों ने उस ह्दय को 20 मिनट तक कॉर्डिएक मसाज करके दवाओं की मदद से फिर से चालू किया. इस तरह से चालू किये गये हार्ट को उन्होंने ट्रांसप्लांट किया. ब्रेन डेथ का सिद्धांत है कि हार्ट संचालित अवस्था में होना चाहिए, रुका हुआ नहीं होना चाहिए. इस तरह के ऑपरेशन में हार्ट को तीन मरीजों में ट्रांसप्लांट किया गया है. दो मरीज ठीक होकर घर चले गये और एक अभी इंटेसिव केयर में है.
प्रत्येक हार्ट ट्रांसप्लांट में प्रिजर्वेटिव सॉलूशन का इस्तेमाल किया जा सकता है. इस सॉलूशन में हार्ट को केवल चार घंटे तक ही रखा जा सकता है. जैसे-जैसे वक्त गुजरता जाता है, वैसे-वैसे हार्ट की क्वालिटी खराब हो जाती है. पहले जो हार्ट रुक जाता था, उसे रिजेक्ट कर दिया जाता था. इस प्रकार कई सारे हार्ट रिजेक्ट हो जाते थे. अब जो यह नयी तकनीक आयी है, उससे उम्मीदें जगी हैं कि अब हिम्मत हारने की बात नहीं है.
फिर से कोशिश करके हार्ट को चालू किया जा सकता है. इससे ट्रांसप्लांट के लिए उपलब्ध हार्ट की संख्या में अब बढ़ोतरी मुमकिन हो पायेगी, क्योंकि हार्ट ट्रांसप्लांट में रुकावट यह है कि जरूरत कई लाख लोगों को है, लेकिन जो हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए उपलब्ध हैं उनकी संंख्या हजारों में ही है. इसलिए ज्यादातर मरीजों को ट्रांसप्लांट की सुविधा मुहैया करा पाना थोड़ा मुश्किल है. इस तकनीक के आने के बाद जाहिर तौर मरीजों में इसके ट्रांसप्लांट की संख्या बढ़ेगी.
हम अपने देश की बात करें तो तकनीकी रूप से पहले हार्ट ट्रांसप्लांट किया जा चुका है. देश का पहला हार्ट ट्रांसप्लांट तीन अगस्त, 1994 को किया गया था. उस समय इस कार्य को डॉ वेणुगोपाल ने अंजाम दिया था और उस टीम का हिस्सा मैं भी था. तकनीकी रूप से हम हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए तैयार हैं, पर हमारे यहां इससे जुड़ी कुछ अलग तरह की समस्याएं हैं. लोगों का माइंडसेट कुछ इस तरह है कि वे हार्ट डोनेट नहीं करना चाहते हैं. परिजन ब्रेन डेड हो चुके व्यक्ति का हार्ट डोनेट नहीं करते हैं और वे इसे भावनाओं से जोड़ कर देखते हैं. इतना ही नहीं, परिजन मृत व्यक्ति के शरीर का कोई भी हिस्सा डोनेट नहीं करना चाहते हैं.
दूसरी बात है कि हमारे पास कंट्री वाइज हार्ट फेलियर की रजिस्ट्री होनी चाहिए, जिनमें इन सब लोगों का नाम हो, एक डाटाबेस हो, जिसकी जरूरत हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए भविष्य में हो सकती है. उन्हें एक सीरियल नंबर दिया जाता है और जिस तरह का जहां हार्ट उपलब्ध होता है, रीजन वाइज कंट्री (क्षेत्र के आधार पर देशों) को दिया जाता है. जैसे अमेरिका में रजिस्ट्री है, तो जो भी हार्ट उपलब्ध होते हैं, उन्हें वरीयता के आधार पर आवंटित किया जाता है. हमारे यहां कोई मरीज किसी दूरदराज इलाके से आता है और दिल्ली में नाम लिखा कर चला जाता है. महीने-दो महीने में कोई एक हार्ट उपलब्ध होता है, तो उससे संपर्क कर पाना मुश्किल होता है. यदि संपर्क कर भी लिया जाता है, तो उसके पास साधन नहीं होता है कि वह तुरंत दिल्ली पहुंच कर हार्ट ट्रांसप्लांट करवा सके.
भारत में हार्ट डोनेशन के कानूनी पक्ष की बात करें तो ऐसी दशा में दो न्यूरोलॉजिस्ट इसे प्रमाणित करते हैं और उसके बाद ही किसी भी प्रकार के ऑर्गन (शरीर के अंग) को शरीर से अलग किया जा सकता है. ऐसा इसलिए भी किया जाता है ताकि मानव अंगों का व्यापार न हो. इसके भविष्य और संभावनाओं की बात करें, तो जेनेटिक इंजीनियरिंग निश्चित रूप से तरक्की करेगी. लैब में कुछ ऑर्टिफिशियल ऑर्गन्स स्टेम सेल की मदद से बनाये जा रहे हैं. स्टेम सेल फाइब्रस स्ट्रक्चर के ऊपर इंप्लांट करके चूहे की किडनी बनाने में कामयाबी मिल चुकी है. उम्मीद की जा रही है कि यह तकनीक और आगे बढ़ेगी, जिससे कई आर्टिफिशियल ऑर्गन्स उपलब्ध होंगे. इससे ट्रांसप्लांटेशन की तकनीक और आगे बढे़गी. इंसान के खुद के स्टेम सेल से नये ऑर्गन्स बनाये जा सकेंगे. ऐसे में ट्रांसप्लांट के बाद फिलहाल जिन इम्युनोसेप्रेसिव दवाओं की जरूरत होती है, वह अब नहीं रहेगी.
(बातचीत पर आधारित)
This article was published in Hindi dainik Prabhat Khabar on oct 28, 2014

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